में वक्ष खोल कर खड़ा हुआ राघव तब मुझपे वार करो


कवी :- मेने हस्तिनापुर के एक चौराहे पर रावण को खड़ा किया उसके सामने राम को खड़ा किया , वो त्रेता नहीं कलियुग भी जितना बीत  चूका उतना ,आज की बात करता हु। राम का स्वभाव की उन्होंने रावण को देखा, रावण को देखा तोह उसका वध करना उनकी नियति है और मरना रावण की ।


इस बार जैसे ही राम ने दशकंधर को ललकारा है,
तरकश से तीखे तीर लिए काँधे से धनुष उतारा है,
वैसे ही विकल दशानन का आकुल विद्रोही मन डोला,
वाणी में विस्फोटक भर कर वो राघव से ऐसे बोला,
रावण पर बाण चलाने का हे राम उपाय नहीं करना,
हे दशरत नंदन सावधान ऐसा अन्याय नहीं करना,
तुम मर्यादा पुरुषोत्तम हो, करुणा निधान कहलाते हो,
दुष्टों का करते हो विनाश, धरती से पाप मिटते हो,
दुनिया का सारा पाप-ताप क्या मुझमे ही दिखलाया है,
केवल मुझपे ही बार-बार तुमने धन बाण उठाया है,
पहले सागर उसपार मिली फिर सागर के इस पार मिली,
अपराध किया था एक बार पर सजा हज़ारो बार मिली,
में रक्ष संस्कृति का स्वामी मेने तोह अपना काम किया,
हे आर्य पुत्र नाहद मुझको इस दुनिया ने बदनाम किया ,
तुम नायक हो म खलनायक बेशक मुझपर तुम वार करो,
भारत के क्रूर दरिंदो का लेकिन पहले संहार करो,

मुझपे आरोप लगता है और मुझे हर पापी के सामने खड़ा कर दिया जाता है उपमा में, यह वही देश है न जो आज यहाँ तक पहुंच गया है की पैदा हुई बच्चिया तक सुरक्षित नहीं है, आखिर मनुष्य की मानसिकता कितनी गिरे गी। रावण से तुलना मत करो । उसने कहा की :-

माना मेने धर साधु वेश वैदेही का अपहरण किया,
लेकिन मर्यादा के विरुद्ध आगे न कोई आचरण किया,
सीता अशोक वाटिका रही मेरा इतना ही नाता था,
मेरी पटरानी बजाओ यह कह कर के समझाता था,
में राक्षस हूं मेरा स्वभाव भय दिखलाता धमकाता था,
पर जब जाता था पास कभी,पत्नी को लेकर जाता था,
जिसको अपराध कहोगे तुम ऐसा तोह कुछ भी हुआ नहीं,
लंका में मेने सीता को एक ऊँगली से भी छुया नहीं,
लेकिन जिस भारत को तुम अपनी मात्र भूमि बतलाते हो,
जिसके आगे तुम मेरी सोने की लंका ठुकराते हो,
उस भारत में है राघवेंद्र पापो की नदी बह रही है,
जिसको तुम माता कहते हो कितने दुःख सह रही है,
है नहीं सुरक्षित अबलाये, हे राम तुम्हारे भारत में,
नित लूटी जाती बालाये है, हे राम तुम्हारे भारत में,
कर दिया कलंकित साधुवेश भारत के नमकहरामों ने,
अपराधी कुटिल कामियो ने ज्ञानेश्वर आशारामो ने,
मर्यादा की सब सीमाएं टूटी जाती है,
कितनी दामिनिया,निर्भया सड़को पे लूटी जाती है,
हे राघवेंद्र इन दुष्टों पर क्यों धन टंकार नहीं करते,
लज्जा के क्रूर लूटेरो पर क्यों बाण प्रहार नहीं करते,
अरे इन पापी अधम पिशाचो के सीने पर प्रथम प्रहार करो,
में वक्ष खोल कर खड़ा हुआ राघव तब मुझपे वार करो ॥

रावण एक तर्क और देता है, एक वर्ग को और खड़ा करता है उस वर्ग विशेष का कोई व्यक्ति यह पढ़ रहा हो में उसे बहुत आदर पूर्वक कहता हु वो अपवाद होगा, उसके लिए नहीं है पर है। रावण कहता है :-

याद तुम्हे जब लक्ष्मण के सीने में शक्ति समायी थी,
तब मेरे सुषेण ने ही तब उनकी जान बचायी थी,
क्या राजवेधी ने दुश्मन को उपचार उचित था दिया नहीं,
यह लंका की मर्यादा थी बदले में कुछ भी लिया नहीं,
भारत के वेदयराघव जो विशेषज्ञ कहलाते है ,
यर्ह महापुरुष कैसे अपनी सेवा का धर्म निभाते है,
भूखे-नंगे बीमारों से पहले धन जमा कराते है,
तब जाके यह सेवा धर्मी रोगी को हाट लगते है,
और जो इन अपराधी वेद्यो की कुल फीस नहीं भर पाते है,
कितने ही शल्यचिकित्सा की मेजो पर ही मर ही मर जाते है,
ये नहीं चिकित्सक है राघव, यह धन के निपट लूटरे है,
है दशरतनन्दन यह पापी सारे भारत को घेरे है,
पहले इन राज रोगियों का उपचार करो,
में वक्ष खोल कर खड़ा हुआ राघव तब मुझपे वार करो ॥

में तोह लंका का राजा था दुनिया का वैभव ले आया,
सारी दुनियाँ में मेने लंका को सोने से चमकाया,
लंका का कोई व्यक्ति कभी हे राम भूख से मारा नहीं,
मेने लंका का धन लेकर दूसरे देश में भरा नहीं,
भारत के धन कुबेर अपना पैसा पचा नहीं पाए,
तुम तोह भारत के रक्षक थे अपना धन बचा नहीं पाए,
चोरी से और दलाली से जनता का शोषण करते है,
ये नए लूटेरे भारत का पैसा विदेश में भरते है,
ये उजड़े-उजड़े अपराधी ईमान धरम सब भूल गए,
इनके कारन कितने किसान बेबस फांसी पे झूल गए,
सत्ता इनके कब्जे में है इसलिए शान से ऐंठे है,
ऊपर से लेकर निचे तक ये भ्रस्टचारी बैठे है,
पहले इन देशद्रोहीयो के सीने पर बाण प्रहार करो,
में वक्ष खोल कर खड़ा हुआ राघव तब मुझपे वार करो ॥

मेरी लंका के बाशिंदे लंका पर मर-मिट जाते थे,
लेकिन दुश्मन तक कभी नहीं घर की खबरे पहुंचते थे,
लंका के लाखो वीरो ने रण में खुद को बलिदान किया,
में अच्छा था या बुरा किन्तु मेरी ज़िद का सम्मान किया,
हा एक विभीषण था जिसने दुश्मन को गले लगाया था,
मेने उस लंका द्रोही को लंका से मार भगाया था,
भारत के कुछ गद्दारो ने दुश्मन से हात मिलाया है,
आतंकवादियों को घर में इन दोस्तो को ठहराया है,
घर-घर विस्फोट बमो के है आतंकवाद का साया है,
हे राघवेंद्र इन दुष्टों ने ऐसा कोहराम मचाया है,
इनके कारण चौराहो पर निर्दोषो का लघु बह रहा रहा है,
वो चीख-चीख कर राघवेंद्र तुमसे बस यही कह रहा है,
यह लाशो के व्यापारी है पहले इनका संघार करो,
में वक्ष खोल कर खड़ा हुआ राघव तब मुझपे वार करो ॥

रावण ने कितना बड़ा सवाल उठा दिया, राम ने तोह धनुष बाण लिया था पर रावण ने अपने बाण से अपने शब्द बाण से राम को किस तरह से आहात कर दिया। उन कहा :-

रावण से भी सौ गुना बड़े ये पापी अत्याचारी है,
लज्जा के धन के अपहर्ता अपराधी भ्रष्टाचारी है,
केवल मेरा वध करने का संकल्प हृदय में पाल लिया,
तुमने बस रावण को देखा और अपना धन-बाण संभल लिया,
आखिर कबतक बस राघव मेरा ही संघार करोगे तुम,
कर चुके मेरा वध एक बार और कितनी बार करोगे तुम,
तुम मर्यादा पुरुषोत्तम हो कैसे मर्यादा तोड़ोगे,
एक ही पाप की सजा मुझे सौ बार भले कैसे डोज,
हे कमल नैन हो सावधान अवसर है नैन भिगोने का,
कुछ लोगो को विश्वास नहीं है राम तुम्हारे होने का,
हे राघवेंद्र इन लोगो को अपनी पहचान कराओ तुम,
अपने धन की टंकारो से अपनी पहचान कराओ तुम,
भारत माता की पीड़ा का उपचार नहीं होने वाला,
मेरा वध करके भारत का उद्धार नहीं होने वाला,
पहले इन नीचो से अपनी धरती का हल्का भार करो,
में वक्ष खोल कर खड़ा हुआ राघव तब मुझपे वार करो ॥

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